सौरभ भट्ट (जयपुर), अनिल गुप्ता (भोपाल) पी श्रीनिवास राव (रायपुर). चुनावी मौसम में सरकारें जमकर मुफ्त चीजें बांटती हैं। शनिवार को चुनाव के एेलान के ठीक पहले तक तीन राज्यों- मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ये ट्रेंड जमकर दिखा। इन तीन राज्यों और तेलंगाना (यहां भी जल्द चुनाव होने हैं) ने ही करीब तीन हजार करोड़ रुपए के मोबाइल, साड़ी, जूते-चप्पल आदि मुफ्त में बांट दिए हैं या इसकी घोषणा कर चुके हैं।
देश में लंबे समय से चुनावों के समय ऐसी घोषणाओं की झड़ी लगाने की प्रथा चल रही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि परेशानी उन योजनाओं की नहीं है, जिनसे जनता को सीधा फायदा मिलता है। (जैसे- छत्तीसगढ़ में आदिवासी परिवारों को 5 रु. प्रतिकिलो की दर से चना दिया जाएगा)। लेकिन मुफ्त में टीवी, सिम, स्मार्टफोन बांटना गलत है।
मध्यप्रदेश: 100 करोड़ खर्च कर बांटे जूते, साड़ी : मप्र सरकार ने आदिवासियों और तेंदूपत्ता संग्राहकों को जूते, चप्पल, साड़ी और पानी की कुप्पी बांटी। करीब 100 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। सरकार ने बिजली के बिल के बकाएदारों को 200 रु. प्रतिमाह के फ्लैट रेट पर बिजली देने की घोषणा की है। स्कीम से सरकार को 5,200 करोड़ रु. के रेवेन्यू का नुकसान हुआ।
राजस्थान: जनता को बांटेंगे 1 हजार करोड़ के मोबाइल : राजस्थान में वसुंधरा सरकार ने एक करोड़ से ज़्यादा गरीब लोगों को मुफ्त मोबाइल फोन देने की घोषणा की है। इसके लिए एक हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। सरकार फोन के लिए 500 रुपए की पहली किस्त भामाशाह योजना के तहत महिला मुखिया के खाते में जमा करवाएगी। फोन का रिचार्ज भी सरकार ही करवाएगी।
छत्तीसगढ़: 55 लाख स्मार्टफोन, 1632 करोड़ खर्च : सरकार करीब 55 लाख लोगों को स्मार्टफोन बांटेगी। इसमें 1632 करोड़ रु. खर्च होंगे। शुरुआत में सरकार इसके साथ जियो की सिम दे रही थी, जिसमें 6 माह का पैक पहले से एक्टिव था। संचार क्रांति योजना के तहत महिलाओं-युवतियों को एंड्रॉयड फोन दिए जाने हैं। अब तक करीब 21 लाख से अधिक फोन दिए जा चुके हैं।
तेलंगाना : पहले 220 करोड़ की साड़ियां बांटी, अब 280 करोड़ की तैयारी : के. चंद्रशेखर राव अभी तेलंगाना के कार्यवाहक मुख्यमंत्री हैं। केसीआर की सरकार इस साल बठुकम्मा फेस्टिवल (12 अक्टूबर) में 96 लाख साड़ियां बांटने वाली थी। लेकिन चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी है। इस पर 280 करोड़ रुपए खर्च होने थे। गरीबों को साड़ी बांटने की यह स्कीम पिछले वर्ष शुरू की गई थी, जिसमें करीब 220 करोड़ रु. की साड़ियां बांटी गई थीं।
2% वोट भी बड़ा असर डाल सकते हैं : सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि मोबाइल आदि चीजें बांटना अनुचित है। लेकिन आज के समय में दो-तीन फीसदी वोट से बहुत असर पड़ जाता है। ऐसा करना विकास और अन्य प्रमुख मुद्दों से ध्यान भटकाने के काम भी आता है। जब विकास की बात होती है तो सरकार इन घोषणाओं को हथकंडे के रूप में भी इस्तेमाल करती है। इससे फोकस हट जाता है। तमिलनाडु में इसका पुराना इतिहास है। वहां पर शोध हो रहे हैं कि क्या-क्या बांटना है?
यह वोट के लिए रिश्वत देने जैसा : संजय कुमार कहते हैं कि उत्तर भारत में यह ट्रेंड अभी शुरुआती फेज में है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच इस संबंध में कोई अंतर नहीं है। तरीकों में अंतर हाे सकता है। इस संबंध में बात करने पर एडीआर के संस्थापक और चेयरमैन त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन सभी पार्टियां ऐसा करती हैं। सवाल यह है कि जो वस्तुएं या सामान सरकारें बांटती हैं वह जनता का पैसा ही तो है। एक हद के बाद तो यह वोट के लिए रिश्वत देने जैसा ही लगता है। सरकार को गरीबों के जीवन में स्थाई बदलाव और रोजगार को ध्यान में रखकर योजनाओं की घोषणा करनी चाहिए। लोग कमाएंगे और फिर खाएंगे तो बेहतर रहेगा।
दुर्गा पूजा के लिए ममता ने दिया 28 करोड़ का चंदा : सिर्फ मुफ्त में चीजें ही नहीं बांटी जा रही हैं। बल्कि और भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2019 चुनाव को ध्यान रखते हुए पहली बार करीब 28 हजार दुर्गा पूजा समितियों को 28 करोड़ रुपए चंदा देने की घोषणा की थी। बीते शुक्रवार ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने चंदा देने पर रोक लगाई है।
घर वापसी पर पांच केस वापस : ऐसे ही राजस्थान में सरकार ने छह माह पहले भाजपा में लौटे राज्य सभा सांसद डाॅ. किरोड़ीलाल मीणा और उनकी पत्नी विधायक गोलमा देवी के पांच केस वापस लेने के आदेश जारी किए हैं। पुरानी बात करें तो मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने भी 1980 में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को पट्टे देने का नियम बना दिया था। इसी तरह पिछले लोकसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु में एआईएडीएमके ने बकरी, केबल टीवी, ब्लेंडर्स, पंखे और सोना देने की घोषणा की थी।
राजनीतिक पार्टियों ने निकाला उपहार का रास्ता : राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे के मुताबिक चुनाव लड़ने का और एंटी इनकमबेंसी को मात देने का सरकारों का यह मॉडल बन गया है। नकदी बांटेंगे तो वह गैर कानूनी है। ऐसे में वे लैपटॉप, मोबाइल, साइकिल या दूसरी चीजें बांटते हैं। मोबाइल जनता की बुनियादी आवश्यकता बन गया है, उन्हें जरूरत भी है। इसलिए मोबाइल ऐसी रणनीति है जिससे पार्टियों को फायदा होता है। इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। समस्या यह है कि हमारी सरकारें वेलफेयर स्टेट तो रही नहीं है, अगर ऐसा होता तो लोगों के सही कल्याण का मॉडल तैयार करतीं।
सबसे भ्रष्ट गोवा : द इलेक्टोरल इंटीग्रिटी प्रोजेक्ट नाम की संस्था दुनियाभर में चुनाव में ईमानदारी के मुद्दे पर सर्वेक्षण करवाती है। इस संस्था ने 2015-17 के बीच 9 राज्यों में हुए चुनावों पर एक रिपोर्ट तैयार की। इसमें वोट खरीदने के मामले में गोवा सबसे आगे रहा है। इसके बाद यूपी और तमिलनाडु आते हैं। केरल सबसे ईमानदार रहा।
ये चीजें भी मुफ्त में बंट रही हैं
तमिलनाडु में 2006 से 2010 के बीच डीएमके ने एक करोड़ 52 लाख से ज्यादा टीवी बांटे। इसके लिए करीब 3340 करोड़ रु. खर्च किए। छत्तीसगढ़ सरकार ने 50 लाख ग्रामीण व शहरी आबादी को भूमि का पट्टा देने का निर्णय लिया है। जुलाई से प्रक्रिया शुरू हो गई है। उत्तरप्रदेश में 2012 से 2015 के बीच 15 लाख लैपटॉप बांटे गए। 2012 के चुनाव में इसकी घोषणा की गई थी। एक आरटीआई में पता चला कि 8 लाख लैपटॉप किन्हें दिए गए इसकी जानकारी ही नहीं है। मध्यप्रदेश में हाल ही मेंं रहवासी क्षेत्रों में नियम विरुद्ध खुले नर्सिंग होम्स को कुछ शर्तों के साथ वैध करने की घोषणा की गई।
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