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Saturday, September 1, 2018

‘कड़वे वचन’ देने वाले जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज नहीं रहे, दोपहर तीन बजे होगी अंतिम संस्कार विधि

मुनिश्री को तीन हफ्ते पहले पीलिया हुआ था, इलाज के बावजूद आराम नहीं होने पर उन्होंने संलेखना लेने का फैसला किया था



- तरुण सागर जी महाराज का जन्म मध्य प्रदेश के दमोह स्थित गांव गुहजी में हुआ था

- मध्‍यप्रदेश में उन्हें राजकीय अतिथि का दर्जा प्राप्त था

नई दिल्ली.  जैन मुनि और राष्ट्र संत तरुण सागर जी महाराज (51) नहीं रहे। उनका समाधिमरण शनिवार सुबह 3:18 बजे दिल्ली में हुआ। वे कुछ समय से बीमार थे। उनकी अंतिम संस्कार विधि आज दोपहर तीन बजे दिल्ली से 28 किमी दूर तरुणसागरम में होगी। 

तरुण सागर जी महाराज ने अपने गुरु की अनुमति मिलने के बाद संलेखना का फैसला किया था।

तरुण सागर जी को करीब तीन हफ्ते पहले पीलिया हो गया था। इसके बाद उन्हें यहां मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य सुधरता ना देख उन्होंने इलाज कराना बंद कर दिया था और चातुर्मास स्थल पर जाने का निर्णय लिया था। गुरुवार सुबह उनकी तबीयत बिगड़ी। इसके बाद उन्हें दोबारा अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद अपने गुरु पुष्पदंत सागर महाराज की स्वीकृति के बाद संलेखना (आहार-जल न लेना) लेने का फैसला किया। मुनिश्री के निधन पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुख जताया।





मुनिश्री के सुझाव पर संघ के गणवेश से हटी चमड़े की बेल्ट : 2011 में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) ने मुनिश्री को अपने विजयदशमी के कार्यक्रम में बुलाया था। तब उन्होंने कहा था कि स्वंयसेवक जिस चमड़े की बेल्ट का इस्तेमाल करते हैं वह अहिंसा के विपरीत है। इसके बाद संघ ने अपनी ड्रेस से चमड़े की बेल्ट हटाने का फैसला किया। अब स्वयंसेवक कैनवास की बेल्ट इस्तेमाल करते हैं।
विधानसभाओं में दिए थे प्रवचन : दिल्ली जैन समाज के कार्यकर्ता रमेश चंद्र जैन ने बताया, ‘‘मुनिश्री अपने कड़वे प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध रहे। इसी वजह से उन्हें क्रांतिकारी संत भी कहा जाता था। वहीं, कड़वे प्रवचन नामक उनकी पुस्तक काफी प्रचलित है। समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करने में उन्‍होंने काफी प्रयास किए।’’ मुनिश्री मध्यप्रदेश और हरियाणा विधानसभा में प्रवचन भी दे चुके थे। हरियाणा विधानसभा में उनके प्रवचन पर काफी विवाद हुआ था, जिसके बाद संगीतकार विशाल ददलानी की टिप्पणी पर बवाल हुआ था। तब विशाल को माफी मांगनी पड़ी थी। मुनिश्री को मध्‍यप्रदेश सरकार ने 6 फरवरी 2002 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था।
छत्तीसगढ़ में ली थी दीक्षा : तरुण सागर जी महाराज का मूल नाम पवन कुमार जैन था। उनका जन्‍म दमोह (मध्यप्रदेश) के गांव गुहजी में 26 जून, 1967 को हुआ। मुनिश्री ने 8 मार्च 1981 को घर छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ में दीक्षा ली। 
क्या है संलेखना : जैन धर्म के मुताबिक, मृत्यु को समीप देखकर धीरे-धीरे खानपान त्याग देने को संथारा या संलेखना (मृत्यु तक उपवास) कहा जाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2015 में इसे आत्महत्या जैसा बताते हुए उसे भारतीय दंड संहिता 306 और 309 के तहत दंडनीय बताया था। दिगंबर जैन परिषद ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। दिल्ली स्थित लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के प्रोफेसर वीर सागर जैन ने बताया कि संथारा की प्रक्रिया 12 साल तक भी चल सकती है। यह जैन समाज की आस्था का विषय है, जिसे मोक्ष पाने का रास्ता माना जाता है।

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