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Saturday, October 6, 2018

नवरात्रि 2018: कब है पहला नवरात्र, पूजा विधि के साथ जानिए क्या खाएं व्रत के दौरान


image credit-https://bhaskar.com
When Is 1st Navratra: मां दुर्गा का आह्वान और स्थापना दोनों ही 10 अक्टूबर को सुबह 6:20 से 9:50 तक करें।

मां दुर्गा का आह्वान और स्थापना दोनों ही 10 अक्टूबर को सुबह 6:20 से 9:50 तक करें। यही नवरात्रि का पहला और दूसरा दिन भी है। प्रतिपदा और द्वितिया तिथि एक ही दिन होने से शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी दोनों देवियों की पूजा बुधवार को घट स्थापना के साथ ही करनी चाहिए। दाेनों देवियों की पूजा के साथ व्रत भी होगा। उत्तर–पूर्व दिशा यानी (ईशान कोण) देवताओं की दिशा है। इसलिए, इस दिशा में माता की प्रतिमा और घट स्थापना करें। स्थापना और पूजा करने के बाद सुबह देवी पूजन में माता को फल व मिठाई और रात में दूध का भोग लगाएं। पूजा के समय दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अखंड दीपक जलाएं जो नौ दिन तक जलता रहे। इसके बाद व्रत या उपवास का संकल्प लें। पूरे दिन व्रत या उपवास के दौरान माता को चढ़ाया गया प्रसाद ही खाना चाहिए। इसके अलावा ऋतु फल यानी सीजन के हिसाब से फल खाने चाहिए।

देवी शैलपुत्री - 
पहले दिन की नवरात्रि में शक्ति के शैलपुत्री रुप की आराधना की जाती है, क्योंकि मां दुर्गा पर्वतराज हिमालय की कन्या हैं। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में ये सर्वशक्ति प्रजापति दक्ष की बेटी और भोलेनाथ शंकर जी की पत्नी थीं, तब इनका नाम सती था। नवरात्रि के नौ दिन श्रद्धानुसार माता के विशेष मंत्रों का जाप करना चाहिए। मां की कृपा प्राप्त करने के लिए सप्तशती के मंत्रों से हवन करने का विधान है। सप्तशती के पाठ से मां विशेष प्रसन्न होती है। नवरात्रि के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन कर मां की पूजा करनी चाहिए।
देवी शैलपुत्री की पूजा विधि - 
मां शैलपुत्री को पंचामृत से स्नान कराए। लाल कपड़े चढ़ाएं। लाल फूल और लाल चंदन लगाएं। इसके बाद ऊं ब्रह्म शैलपुत्री देव्ये नमः। इस मंत्र का 108 बार जाप करें। गुड़ या शहद का प्रसाद चढ़ाएं। पूजा-प्रसाद करने के बाद क्षमा प्रार्थना करें।
देवी ब्रह्मचारिणी -
इस साल यानी नवरात्रि 2018 में यह दिन 11 अक्टूबर को है। मां ब्रह्मचारिणी तपस्वियों की तरह आचारण करने वाली भगवती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली से है। नवरात्रि के दूसरे दिन माता की आराधना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए उनकी विशेष आराधना करनी चाहिए।
मां के दाएं हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल होता है। उनके वस्त्र तपस्वियों की भांति है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा और साधना करने से कुंडलिनी शक्ति जागृत होती हैं। हिन्दु मान्यता के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय और मैना की पुत्री हैं, जिन्होंने भगवान नारद के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठिन तपस्या की, जिससे खुश होकर ब्रह्माजी ने इन्हे मनोवांछित वरदान दिया जिसके प्रभाव से ये भगवान शिव की पत्नी बनीं। मां ब्रह्मचारिणी अपने भक्तों को असंख्य लाभ देने में सक्षम है।
News Source:this article has been taken from https://www.bhaskar.com

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