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Wednesday, February 28, 2018

ऐसा है हरिवंशराय बच्चन का होली का रंग भाव...

सिलसिला फिल्म का गीत 'रंग बरसे भीगे चुनरवाली...'होली पर आपको हर जगह सुनाई पड़ता होगा। इस गीत की रचना प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने की थी। बच्चन ने इस गीत के अलावा होली पर एक और कविता की लिखी है। जिसे हम अपने पाठकों के समक्ष रख रहे हैं।  

यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग और रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो!...


आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो!

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!...

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को...

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!   

तन के तार छुए बहुतों ने मन का तार न भीगा...

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छुए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है

रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है...

अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है


साभार-कविता कोश 

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